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अवैध रिश्ते को नहीं मिल सकती कानूनी मान्यता: पिता-पति घोषित करने की याचिका हाईकोर्ट ने की खारिज


अवैध रिश्ते को नहीं मिल सकती कानूनी मान्यता: हाईकोर्ट

पिता–पति घोषित करने की मांग वाली याचिका खारिज

छत्तीसगढ़ बिलासपुर, 15 जनवरी 2026/ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें एक महिला और उसकी दो बेटियों ने शहर के एक प्रतिष्ठित नागरिक को अपना पति और पिता घोषित करने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून किसी अवैध रिश्ते को वैधता प्रदान नहीं कर सकता

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी महिला की पहली शादी कानूनी रूप से अस्तित्व में है, तो उस विवाह के दौरान जन्मे बच्चों को उसी कानूनी पति की संतान माना जाएगा। भले ही कोई अन्य पुरुष बच्चों को अपनी संतान स्वीकार कर ले या महिला के साथ लिव-इन संबंध में रहे, लेकिन कानूनन बच्चों की वैधता पहले पति से ही जुड़ी रहेगी


ये था पूरा मामला

बिलासपुर के लिंक रोड निवासी दुर्गेश नंदनी और संतोषी जांगड़े ने अपनी मां चंद्रकली के साथ मिलकर बृजमोहन दुआ के खिलाफ फैमिली कोर्ट में परिवाद दायर किया था।

याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि चंद्रकली को बृजमोहन दुआ की कानूनी पत्नी घोषित किया जाए और दुर्गेश नंदनी व संतोषी जांगड़े को उनकी कानूनी बेटियां व उत्तराधिकारी माना जाए।


पत्नी को छोड़कर चला गया था पहला पति

चंद्रकली ने कोर्ट को बताया कि उसकी शादी वर्ष 1960 में आत्मप्रकाश से हुई थी। आत्मप्रकाश आध्यात्मिक प्रवृत्ति का था और 1984 में घर छोड़कर चला गया

इस बीच, वर्ष 1971 में चंद्रकली ने बृजमोहन दुआ के साथ वरमाला डालकर विवाह किया और दोनों पति–पत्नी की तरह साथ रहने लगे। इस प्रकरण में बृजमोहन दुआ ने भी कोर्ट में यह स्वीकार किया था कि चंद्रकली उनकी पत्नी है और दोनों बेटियां उनकी संतान हैं।


फैमिली कोर्ट के फैसले को दी गई थी चुनौती

फैमिली कोर्ट ने इस प्रकरण को संपत्ति विवाद से जुड़ा मामला मानते हुए, प्रस्तुत साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर वर्ष 2019 में परिवाद खारिज कर दिया था।

फैमिली कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की गई, लेकिन हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए अपील भी खारिज कर दी।


हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब तक पहली शादी कानूनन समाप्त नहीं होती, तब तक दूसरा संबंध वैध नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में भावनात्मक स्वीकार्यता भले ही हो, लेकिन कानूनी अधिकार और उत्तराधिकार कानून के अनुसार ही तय होंगे।

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