(CG ई खबर | प्रमुख संपादक : ओम प्रकाश पटेल)
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि पति पत्नी की कथित क्रूरता को माफ कर उसके साथ पुनः वैवाहिक जीवन बिताता है, तो वह बाद में उसी आधार पर तलाक का दावा नहीं कर सकता। हाईकोर्ट ने पत्नी की अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत द्वारा पारित तलाक के आदेश को निरस्त कर दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1) के तहत तलाक तभी संभव है, जब जिस आधार पर तलाक मांगा गया हो, उसे याचिकाकर्ता ने माफ न किया हो। यदि पति ने पत्नी की कथित क्रूरता को क्षमा कर उसके साथ दोबारा वैवाहिक जीवन शुरू कर दिया है, तो वह उस आधार पर तलाक का अधिकार खो देता है।
मामले में पति ने पत्नी पर दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराने और एक अन्य पुरुष से संबंध होने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। हालांकि, न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड से यह स्पष्ट हुआ कि पत्नी द्वारा धारा 498-ए के तहत एफआईआर दर्ज कराए जाने के बाद पति ने न केवल उसे माफ किया, बल्कि करीब सात वर्षों तक पत्नी के साथ पति-पत्नी के रूप में वैवाहिक जीवन भी बिताया।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे में पति द्वारा बाद में उन्हीं आरोपों के आधार पर तलाक की मांग करना कानूनन स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि माफी और पुनः सहवास (Condonation) की स्थिति में तलाक का आधार स्वतः समाप्त हो जाता है।
इस फैसले को वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नज़ीर के रूप में देखा जा रहा है, जिससे भविष्य में ऐसे प्रकरणों में निचली अदालतों को मार्गदर्शन मिलेगा।

