
दिनेश अग्रवाल
(CG ई खबर | प्रमुख संपादक : ओम प्रकाश पटेल)
कोरबा–बांकीमोंगरा : जमीन सीमांकन के बाद दस्तावेजों में कूटरचना के गंभीर मामले में जहां एक ओर राजस्व विभाग और पुलिस की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं, वहीं न्यायालयीन आदेश के बाद एसपी द्वारा सख्ती दिखाए जाने से मामला फिर चर्चा में आ गया है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि इस पूरे षड्यंत्र से जिस व्यक्ति को सीधा लाभ मिला, वह आज भी आरोपी की सूची से बाहर है।
इस मामले में तत्कालीन भू-अभिलेख अधीक्षक जे.पी. सिंह और हाल ही में तीन राजस्व निरीक्षकों को जेल भेजा जा चुका है, लेकिन मुख्य लाभार्थी दिनेश अग्रवाल पिछले 8 वर्षों से कानून की पकड़ से बाहर है। शिकायत, जांच प्रतिवेदन और दस्तावेजों में उसका नाम प्रमुख रूप से सामने आने के बावजूद उसे अब तक “अभयदान” क्यों मिला हुआ है, यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
क्या है पूरा मामला
वर्ष 2018 के जनदर्शन में रामकरण अग्रवाल और संतोष अग्रवाल ने आयुक्त, बिलासपुर के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर अपने स्वामित्व की भूमि खसरा नंबर 113/2, रकबा 0.291 हेक्टेयर, ग्राम मोंगरा, प.ह.नं. 15, तहसील कटघोरा, जिला कोरबा का जिला स्तरीय सीमांकन कराए जाने की मांग की थी। आयुक्त के निर्देश पर कलेक्टर कोरबा द्वारा सीमांकन आदेश जारी किया गया।
03 मार्च 2016 को गठित सीमांकन दल ने मौके पर पहुंचकर सीमांकन किया और पंचनामा तैयार किया। पंचनामा में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख था कि उक्त भूमि पर दिनेश अग्रवाल पिता गोविंद अग्रवाल, निवासी बांकीमोंगरा सहित अन्य लोगों द्वारा अतिक्रमण किया गया है। पंचनामा पर भूमि स्वामियों और गवाहों के हस्ताक्षर भी मौजूद थे।
यहीं से शुरू हुई कूटरचना
सीमांकन के बाद जब प्रमाणित प्रतिलिपि कलेक्टर कार्यालय से प्राप्त की गई, तो यह सामने आया कि पंचनामा और प्रतिवेदन में दिनेश अग्रवाल के अतिक्रमण को “शून्य (0)” कर दिया गया है। यानी मौके पर दर्ज अतिक्रमण को दस्तावेजों से गायब कर दिया गया।
इस पर 25 अप्रैल 2016 को जनदर्शन में कलेक्टर से शिकायत की गई। शिकायत के बाद पुनः सीमांकन और जांच के लिए जांच दल गठित किया गया।
जांच में हुआ बड़ा खुलासा
30 सितंबर 2016 को जांच दल ने प्रतिवेदन सौंपते हुए स्पष्ट किया कि तत्कालीन भू-अभिलेख अधीक्षक जे.पी. सिंह ने सीमांकन पंचनामा में ऊपरी लेखन कर अतिक्रमण को शून्य किया। सबसे गंभीर बात यह रही कि संशोधन के बाद न तो कारण दर्ज किया गया और न ही दोबारा संबंधित पक्षों के हस्ताक्षर लिए गए।
जांच में यह भी स्पष्ट किया गया कि पीड़ितों की भूमि पर दिनेश अग्रवाल का अतिक्रमण था और कलेक्टर ने भी जांच प्रतिवेदन की पुष्टि अपने आदेश से की।
फिर भी सवाल वही
जब जांच, दस्तावेज और आदेशों में दिनेश अग्रवाल का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है, तो आखिर वह आरोपी क्यों नहीं बनाया गया? किस आधार पर पुलिस ने उसे इस पूरे कूटरचना से बाहर रखा? क्या प्रभावशाली व्यक्ति होने के कारण उसे बचाया जा रहा है?
अब जनता पूछ रही है
- 8 साल तक दिनेश अग्रवाल को किसका संरक्षण मिला?
- जब अधिकारियों को जेल भेजा जा सकता है, तो मुख्य लाभार्थी पर कार्रवाई क्यों नहीं?
- क्या पुलिस निष्पक्ष जांच कर पाएगी या मामला फिर ठंडे बस्ते में जाएगा?
यह मामला अब केवल जमीन सीमांकन का नहीं, बल्कि न्याय, निष्पक्षता और सिस्टम की साख का बन चुका है। जनता की नजरें अब इस पर टिकी हैं कि क्या दिनेश अग्रवाल का नाम भी आरोपी सूची में जुड़ता है या फिर सवाल यूं ही हवा में तैरते रहेंगे।
