ग्रामीणों द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में आरोप लगाया गया है कि पिछले 12 वर्षों से वे अपनी जमीन, रोजगार और पुनर्वास की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन केवल आश्वासन देता रहा है। ग्रामीणों के अनुसार 13 मई 2014 से उनकी जमीनों पर स्टे लगाया गया था तथा 18 जुलाई 2018 को अधिग्रहण प्रक्रिया प्रारंभ की गई, लेकिन आज तक प्रभावित परिवारों को न मुआवजा मिला, न रोजगार और न ही उचित पुनर्वास की व्यवस्था की गई।
ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से जमीन विवाद और अधिग्रहण की स्थिति के कारण वे आर्थिक और सामाजिक संकट से गुजर रहे हैं। उन्होंने भावुक होकर कहा कि वे अपने ही घरों में कैद होकर रह गए हैं। जमीन पर रोक लगने से न तो वे उसे बेच पा रहे हैं और न ही पारिवारिक एवं सामाजिक जरूरतों के लिए आर्थिक व्यवस्था कर पा रहे हैं।
जल संकट और खेती पर असर
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि खदान विस्तार के कारण क्षेत्र का जलस्तर लगातार गिरता जा रहा है, जिससे खेती पूरी तरह प्रभावित हो चुकी है। पीने के पानी की भी गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि एसईसीएल प्रबंधन द्वारा न तो पानी की समुचित व्यवस्था की जा रही है और न ही फसल नुकसान की भरपाई की गई है।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
- 12 वर्षों से लंबित मुआवजे का तत्काल भुगतान
- प्रभावित युवाओं को नियमानुसार स्थायी रोजगार
- बुनियादी सुविधाओं से युक्त पुनर्वास एवं बसाहट स्थल की व्यवस्था
- खेती और जल संकट से हुए नुकसान की उचित क्षतिपूर्ति
“अब आश्वासन नहीं, समाधान चाहिए”
ग्रामीणों ने कहा कि पिछले सात महीनों से लगातार धरना-प्रदर्शन और पत्राचार किया जा रहा है, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला। उनका आरोप है कि प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर लगाते-लगाते लोग मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुके हैं।
ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कहा कि यदि आगामी 15 दिनों के भीतर उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो 21 मई से होने वाले उग्र आंदोलन और खदान बंदी की पूरी जिम्मेदारी एसईसीएल प्रबंधन और जिला प्रशासन की होगी।


