कोरबा। जिले के शिक्षा विभाग में वर्षों से एक ऐसी व्यवस्था चल रही है, जिस पर अब सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि राजनीतिक सेटिंग, पहुंच और जुगाड़ के दम पर कई शिक्षक, व्याख्याता और प्राचार्य मूल शालाओं से दूर प्रशासनिक पदों पर जमे हुए हैं। सरकार द्वारा जिनकी नियुक्ति स्कूलों में अध्ययन-अध्यापन के लिए की गई थी, वे आज विभिन्न दफ्तरों में बाबूगिरी और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते नजर आ रहे हैं।
जानकारों का कहना है कि यदि किसी कर्मचारी की दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों में पकड़ मजबूत हो, तो सरकार किसी की भी हो, उसका प्रभाव बना रहता है। यही कारण है कि शिक्षा विभाग में कई लोग वर्षों से प्रशासनिक पदों पर टिके हुए हैं। खासकर राजस्व और शिक्षा कार्यालयों में ऐसे कई कर्मचारी पदस्थ हैं, जिनका मूल कार्य पढ़ाना है, लेकिन वे स्कूल लौटना नहीं चाहते।
सूत्रों के अनुसार, इन पदों पर बने रहने की सबसे बड़ी वजह अतिरिक्त आय और कार्यालयीन सुविधा मानी जा रही है। लंबे समय तक दफ्तरों में बैठने के बाद अब कई लोगों की रुचि शिक्षण कार्य से हट चुकी है। आरोप है कि कुछ लोग कुर्सी बचाने और प्रभाव बनाए रखने में ही ज्यादा रुचि दिखा रहे हैं।
जिले में सरकारी शिक्षा व्यवस्था पहले से ही सवालों के घेरे में रही है। उच्च अधिकारी लगातार व्यवस्थाओं में सुधार की बात करते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। शिक्षा विभाग में लंबे समय से प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी के भरोसे कामकाज चलाया जा रहा है। स्थायी नियुक्ति नहीं होने के कारण प्रशासनिक नियंत्रण कमजोर माना जा रहा है।
विभागीय चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि एक कथित “पंडित जी” प्रभारी डीईओ और लोगों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। आरोप है कि किसी भी काम को करवाने के लिए इनके माध्यम से “व्यवस्था” पहुंचानी पड़ती है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभागीय गलियारों में इस तरह की चर्चाएं लगातार बनी हुई हैं।
इतना ही नहीं, खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) और बीआरसी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी नियमित प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति नहीं की गई है। कई जगहों पर शिक्षक और व्याख्याता ही अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं। इसका सीधा असर उन स्कूलों पर पड़ रहा है, जहां उनकी मूल पदस्थापना है। शिक्षकों की अनुपस्थिति से विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होने की बात सामने आती रही है।
विभाग के जानकार बताते हैं कि जिले में केवल ABEO का पद ही ऐसा है, जहां परीक्षा प्रक्रिया के माध्यम से प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं। इसके अलावा अधिकांश जिम्मेदार पदों पर शिक्षकीय वर्ग के लोग ही वर्षों से जमे हुए हैं।
विभाग की फजीहत कराने वालों को संरक्षण?
शिक्षा विभाग पहले भी पदोन्नति मामलों को लेकर विवादों में रह चुका है। कई मामले हाई कोर्ट तक पहुंचे, लेकिन आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। विभागीय चर्चाओं में यह भी कहा जाता है कि प्रभाव और पैसों के दम पर कार्रवाई की फाइलें दबा दी जाती हैं।
सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति भी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। स्कूलों में अनुशासन, गणवेश वितरण और शिक्षा गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। गणवेश वितरण में गड़बड़ी, किताब वितरण में अनियमितता और भ्रष्टाचार जैसे आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। यहां तक कि नई किताबों के कबाड़ में मिलने और ठेलों पर पुड़िया बनाने में इस्तेमाल होने जैसी घटनाएं भी चर्चा में रही हैं।
इसके बावजूद अब तक किसी बड़े स्तर की जांच या जिम्मेदारी तय किए जाने की कार्रवाई नहीं होने से विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि जब पद की गरिमा से ज्यादा महत्व पैसों और पहुंच को मिलने लगे, तब शिक्षा व्यवस्था का कमजोर होना स्वाभाविक है।

