“मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं… मेरी मर्जी!”
पहले भी हुआ स्थानांतरण, पर कार्यशैली में नहीं आया सुधार; करोड़ों के विकास कोष के दुरुपयोग के आरोप
[ CG ई खबर : विजय चौहान | बिलासपुर संभाग ब्यूरो चीफ ]
कोरबा/पाली।
ग्राम पंचायत डोंड़की में पदस्थ सचिव जुगुल श्रीवास की कथित मनमानी, लापरवाही और अनियमितताओं से तंग आकर पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों का सब्र आखिरकार टूट गया। सरपंच, पंचों और ग्रामीणों ने एकजुट होकर कलेक्टर को ज्ञापन सौंपते हुए सचिव के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग की है।
ग्रामीणों का आरोप है कि सचिव न तो नियमित रूप से पंचायत कार्यालय आते हैं और न ही अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। पंचायत कार्यालय अधिकांश दिनों में बंद रहता है और सचिव केवल ग्राम सभा के दिन ही दिखाई देते हैं। जाति प्रमाण पत्र जैसे जरूरी दस्तावेजों के लिए ग्रामीणों को उनके निजी निवास के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जबकि फोन कॉल तक उठाना सचिव जरूरी नहीं समझते।
अपमानजनक भाषा और धमकियों के आरोप
शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि सचिव पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों से अभद्र भाषा में बात करते हैं और खुलेआम कहते हैं—
“मैंने जनपद से जिला स्तर तक पैसा देकर काम लाया है, जैसा मन होगा वैसा काम करूंगा, जहां शिकायत करनी है कर लो।”
इस तरह के बयानों से पंचों और सरपंच की भूमिका ही गौण हो गई है।
नवनिर्वाचित सरपंच की सरलता का उठाया जा रहा लाभ
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि नवनिर्वाचित और अनुभवहीन सरपंच श्रीमती प्रमिला पैकरा की सरलता का सचिव फायदा उठा रहे हैं, जबकि नियमों और कार्यप्रणाली के अनुसार उन्हें मार्गदर्शन देना चाहिए था।
पुराना रिकॉर्ड भी संदेह के घेरे में
मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि सचिव जुगुल श्रीवास पर पूर्व पंचवर्षीय कार्यकाल में भी मूलभूत निधि तथा 14वें व 15वें वित्त आयोग की राशि के दुरुपयोग के आरोप लग चुके हैं। ग्रामीणों का दावा है कि तत्कालीन सरपंच की सीधाई का फायदा उठाकर लाखों रुपये का ‘वारा-न्यारा’ किया गया था।
इन्हीं आरोपों के चलते उनका एक बार दूरस्थ पंचायत में स्थानांतरण भी हुआ, लेकिन कुछ ही महीनों में पैरवी कराकर वे पुनः अपने गृह क्षेत्र के नजदीक डोंड़की पंचायत में तैनात हो गए।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन में ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों ने—
- सचिव को तत्काल पंचायत से हटाने
- उनके कार्यकाल में कराए गए सभी विकास कार्यों की निष्पक्ष जांच
- पंचायत में एक जिम्मेदार और ईमानदार सचिव की नियुक्ति
की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि सचिव की मनमानी के चलते गांव विकास से कोसों दूर हो गया है और मूलभूत सुविधाओं के कार्य ठप पड़े हैं।
प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
यह पूरा मामला ग्रामीण प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक बार स्थानांतरण के बावजूद उसी क्षेत्र में वापसी और कार्यशैली में कोई सुधार न होना चिंता का विषय है। अब देखना यह होगा कि कलेक्टर प्रशासन इस मामले में कितनी गंभीरता दिखाता है और ग्रामीणों को न्याय दिलाने के लिए क्या ठोस कदम उठाता है।


