दहेज प्रताड़ना केस में पति और जेठ दोषमुक्त: अदालत में गवाहों के बयानों से कमजोर हुई अभियोजन की कहानी, पूर्व वैवाहिक विवाद भी आया सामने

CG.ई ख़बर


कोरबा/कटघोरा।
थाना दर्री के अपराध क्रमांक 91/2022 से जुड़े बहुचर्चित दहेज प्रताड़ना, धमकी और कथित अश्लील गाली-गलौज के मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, कटघोरा की अदालत ने आरोपी संदीप अग्रवाल और दिनेश अग्रवाल को दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित करने में सफल नहीं रहा

मामले की सुनवाई के दौरान सामने आए न्यायालयीन साक्ष्यों में शिकायतकर्ता के आरोपों के समर्थन में महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आए। दो प्रमुख गवाहों ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया, जबकि मोबाइल फोन से संबंधित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी कथित घटना की पुष्टि नहीं कर सके। अदालत ने शिकायतकर्ता के बयानों में भी अतिशयोक्ति, विरोधाभास और अविश्वसनीयता का उल्लेख किया।

क्या था पूरा मामला?

अभियोजन के अनुसार, संदीप अग्रवाल का विवाह 13 जून 2020 को शिकायतकर्ता से हुआ था। आरोप था कि विवाह के बाद उसके पति और ससुराल पक्ष द्वारा उसके स्वामित्व वाले मकान को अपने नाम स्थानांतरित करने का दबाव बनाया गया और कथित रूप से दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया। इसके अलावा जान से मारने की धमकी देने तथा मोबाइल फोन पर अश्लील गाली-गलौज करने के आरोप भी लगाए गए थे।

हालांकि, अदालत में मामले की सुनवाई आगे बढ़ने के साथ अभियोजन के आरोपों को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आए।

पड़ोसी गवाह ने नहीं किया अभियोजन का समर्थन

अभियोजन पक्ष के गवाह अनिल यादव ने अदालत में बताया कि शिकायतकर्ता का विवाह संदीप अग्रवाल से मंदिर में हुआ था और वह अपने पूर्व पति से हुए बच्चे को साथ लेकर आई थी, जिसे संदीप के परिवार ने स्वीकार किया था।

गवाह के अनुसार, शादी के कुछ समय बाद शिकायतकर्ता और संदीप के बीच विवाद शुरू हो गया। उसने बताया कि शिकायतकर्ता अपने बच्चे के लिए संदीप की संपत्ति में हिस्सा मांग रही थी, जिसके बाद दोनों के बीच विवाद बढ़ता गया। बाद में संदीप, शिकायतकर्ता और उसका बेटा अलग किराए के मकान में रहने लगे, लेकिन वहां भी दोनों के बीच विवाद जारी रहा।

अनिल यादव ने अपने पुलिस कथन के संबंध में बताया कि शिकायतकर्ता का संदीप और दिनेश अग्रवाल से छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद होता था। उसने यह भी कहा कि परिवार के अन्य सदस्यों से कोई विवाद नहीं था और परिवार के किसी सदस्य द्वारा दहेज की मांग कर प्रताड़ित किए जाने की जानकारी उसे नहीं थी।

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जिरह में बच्चे के अधिकार को लेकर कथित धमकी का बयान

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, अभियोजन पक्ष ने अनिल यादव को पक्षविरोधी घोषित कर उससे प्रश्न किए, लेकिन उसने अभियोजन की ओर से दिए गए सुझावों से इनकार किया।

वहीं, बचाव पक्ष की जिरह में अनिल यादव ने यह स्वीकार किया कि शिकायतकर्ता कथित रूप से कहती थी कि यदि उसके बच्चे को अधिकार नहीं दिया गया तो वह आरोपियों को झूठे मामले में फंसा देगी।

मामले के एक अन्य गवाह रिंकी यादव के बयान में भी अभियोजन को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। रिंकी यादव ने आरोपी दिनेश अग्रवाल द्वारा शिकायतकर्ता से लड़ाई करने के संबंध में अभियोजन के कथन से इनकार किया। बचाव पक्ष की जिरह के दौरान उसके सामने भी बच्चे के अधिकार को लेकर कथित रूप से झूठे मामले में फंसाने की बात का उल्लेख आया।

अदालत ने अपने निर्णय में दोनों गवाहों के बयानों का उल्लेख करते हुए कहा कि रिंकी यादव और अनिल यादव ने अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया।

पूर्व पति से जुड़ा विवाद भी अदालत के सामने आया

मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि शिकायतकर्ता की यह दूसरी शादी थी। न्यायालयीन रिकॉर्ड के अनुसार, उसका पहला विवाह अमित गुप्ता से हुआ था और दोनों के बीच वैवाहिक विवाद के बाद तलाक हो चुका था। रिकॉर्ड के अलग-अलग हिस्सों में तलाक के वर्ष को लेकर 2017 और 2018 का उल्लेख मिलता है।

अमित गुप्ता इस मामले में बचाव पक्ष के गवाह के रूप में अदालत में पेश हुआ। उसने अपने बयान में कहा कि शादी के कुछ समय बाद उसके और शिकायतकर्ता के बीच विवाद शुरू हो गया था और बाद में वे अलग रहने लगे थे। उसने यह भी बताया कि उसके खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज हुए थे।

अदालत के निर्णय में यह दर्ज है कि पूर्व पति से संबंधित एक आपराधिक मामले में अमित गुप्ता को दोषमुक्त किया गया था। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पूर्व मामले से संबंधित दस्तावेज वर्तमान प्रकरण से सीधे संबंधित नहीं थे। इसलिए वर्तमान मामले में पूर्व वैवाहिक विवाद को अकेले आरोपों को झूठा साबित करने का आधार नहीं बनाया गया।

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इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य से भी नहीं मिली निर्णायक पुष्टि

मामले में कथित फोन पर गाली-गलौज और धमकी के आरोपों की जांच के लिए दोनों पक्षों के मोबाइल जब्त कर साइबर जांच कराई गई।

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायतकर्ता के मोबाइल से संबंधित तकनीकी जांच में समस्या सामने आई, जबकि आरोपी के मोबाइल से उपलब्ध बातचीत की रिकॉर्डिंग में कथित घटना की तारीख 26 फरवरी 2022 की बातचीत नहीं मिली।

इस तरह, जिस फोन कॉल को मामले के महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया था, उससे संबंधित इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड अभियोजन के आरोपों की निर्णायक पुष्टि नहीं कर सका।

शिकायत और अदालत में बयान के बीच भी सामने आए अंतर

अदालत ने शिकायतकर्ता के न्यायालयीन बयान और प्रारंभिक शिकायत के बीच कई महत्वपूर्ण अंतर पर विचार किया। निर्णय में दर्ज है कि बाद में न्यायालय में बताए गए कुछ गंभीर आरोप प्रारंभिक लिखित शिकायत में दर्ज नहीं थे।

शिकायतकर्ता ने अदालत में मारपीट, जलाने, गंभीर चोट और 10 लाख रुपये की कथित मांग सहित कई आरोप लगाए थे। लेकिन जिरह के दौरान इन आरोपों से संबंधित कई महत्वपूर्ण तथ्यों के प्रारंभिक शिकायत में उल्लेख न होने की बात सामने आई। अदालत ने इन परिस्थितियों को साक्ष्यों के मूल्यांकन के दौरान महत्वपूर्ण माना।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि गंभीर मारपीट और कमर की हड्डी खिसकने जैसे दावों के समर्थन में कोई मेडिकल रिपोर्ट अभियोजन की ओर से पेश नहीं की गई।

स्वतंत्र गवाहों और जब्ती कार्रवाई पर भी सवाल

मामले में मोबाइल जब्ती और पंचनामा के गवाहों ने भी अदालत में अभियोजन की कार्रवाई का समर्थन नहीं किया। कुछ गवाहों ने कहा कि पुलिस ने उनके सामने कोई जब्ती कार्रवाई नहीं की थी और उनसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए थे।

जांच अधिकारी की गवाही के दौरान भी अदालत के सामने यह तथ्य आया कि कॉल डिटेल उपलब्ध कराने वाली कंपनी के संबंधित अधिकारी या कर्मचारी को मामले में गवाह नहीं बनाया गया था।

अदालत का अंतिम निष्कर्ष

सभी मौखिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।

अदालत ने विशेष रूप से शिकायतकर्ता के बयानों में अतिशयोक्ति, विरोधाभास और अविश्वसनीयता का उल्लेख किया तथा कहा कि केवल आरोप लगाए जाने से दहेज मांग और प्रताड़ना का अपराध बिना पुष्टिकारक साक्ष्य के प्रमाणित नहीं माना जा सकता।

इसके बाद न्यायालय ने आरोपी संदीप अग्रवाल को धारा 498-ए/34, 509 और 506 भाग-दो तथा दिनेश अग्रवाल को धारा 498-ए/34 और 506 भाग-दो के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।

निष्कर्ष

यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि गंभीर आपराधिक आरोपों में केवल शिकायत या मौखिक आरोप पर्याप्त नहीं होते, बल्कि अभियोजन को आरोपों को विश्वसनीय और पुष्टिकारक साक्ष्यों के माध्यम से संदेह से परे साबित करना होता है। इस मामले में अदालत के समक्ष गवाहों के बयानों, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, शिकायत और न्यायालयीन बयान के बीच अंतर तथा अन्य परिस्थितियों के मूल्यांकन के बाद अभियोजन की कहानी संदेह से परे प्रमाणित नहीं हो सकी।

महत्वपूर्ण: इस रिपोर्ट में पूर्व पति या अन्य व्यक्तियों द्वारा लगाए गए आरोपों को न्यायालय द्वारा सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। उन्हें केवल न्यायालयीन कार्यवाही में दर्ज बचाव पक्ष के गवाहों के बयान के रूप में उल्लेखित किया गया है।

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