SECL को हाई कोर्ट का झटका: भूमि अधिग्रहण के समय लागू नीति से मिलेगा रोजगार, अस्वीकृति आदेश रद्द

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(CG ई खबर | प्रमुख संपादक : ओम प्रकाश पटेल)

कोरबा/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने SECL की गेवरा परियोजना से जुड़े भूमि विस्थापित परिवार के रोजगार के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने सरोजनी बाई राठौर बनाम SECL मामले में स्पष्ट किया है कि भूमि अधिग्रहण के बाद लागू की गई नई पुनर्वास नीति के आधार पर उस समय अर्जित रोजगार के अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता। रोजगार के दावे का निर्धारण भूमि अधिग्रहण की तारीख पर लागू पुनर्वास नीति के अनुसार किया जाना होगा।

मामला ग्राम नराईबोध की भूमि से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की करीब 0.06 एकड़ यानी लगभग 2.43 डिसमिल भूमि को वर्ष 2009 से 2010 के दौरान गेवरा परियोजना के विस्तार के लिए अधिग्रहित किया गया था। भूमि अधिग्रहण के बाद याचिकाकर्ता की ओर से रोजगार की मांग की गई, लेकिन SECL ने Coal India Limited की वर्ष 2012 में लागू पुनर्वास नीति का हवाला देते हुए रोजगार के दावे को अस्वीकार कर दिया।

SECL की ओर से तर्क दिया गया कि वर्ष 2012 की पुनर्वास नीति में दो एकड़ से कम भूमि रखने वाले प्रभावित भू-स्वामियों के लिए रोजगार का प्रावधान नहीं था। इसी आधार पर याचिकाकर्ता का दावा खारिज कर दिया गया था।

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि जब भूमि का अधिग्रहण वर्ष 2009 से 2010 के बीच हुआ था, तब उस समय जो पुनर्वास नीति प्रभावी थी, उसी के आधार पर प्रभावित व्यक्ति के अधिकारों का निर्धारण किया जाना चाहिए। बाद में लागू की गई नीति के आधार पर पहले से अर्जित अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।

हाई कोर्ट ने अपने पूर्व के निर्णय Pyarelal बनाम SECL, WPC No. 3076/2016 का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि भूमि अधिग्रहण के समय प्रभावित व्यक्ति को जो अधिकार प्राप्त हुए हैं, उन्हें बाद में बनाई गई पुनर्वास नीति के माध्यम से खत्म नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी रिकॉर्ड किया कि SECL ने स्वयं स्वीकार किया है कि प्यारेलाल मामले में हाई कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय को उसके ऊपर किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी गई है और वह निर्णय अंतिम हो चुका है।

हाई कोर्ट ने SECL द्वारा 13 मई 2022 को जारी किया गया अस्वीकृति आदेश रद्द कर दिया। इसके साथ ही SECL को निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता के रोजगार के दावे पर भूमि अधिग्रहण की तारीख पर लागू पुनर्वास नीति के अनुसार दोबारा विचार किया जाए। अदालत ने इस प्रक्रिया को 45 दिनों के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया है।

हाई कोर्ट का यह फैसला SECL की गेवरा, कुसमुंडा और दीपका परियोजनाओं से जुड़े भू-विस्थापित परिवारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेष रूप से उन मामलों में जहां भूमि अधिग्रहण के बाद लागू हुई नई पुनर्वास नीति का हवाला देकर रोजगार के दावे अस्वीकार किए गए हैं, यह निर्णय महत्वपूर्ण कानूनी आधार बन सकता है।

हालांकि, इस फैसले का लाभ प्रत्येक भू-विस्थापित परिवार को स्वतः मिलने का अर्थ नहीं है। संबंधित मामले में भूमि अधिग्रहण की तारीख, उस समय लागू पुनर्वास नीति और निर्धारित पात्रता शर्तों के आधार पर रोजगार के दावे पर निर्णय लिया जाएगा।

कोरबा से CG ई खबर के लिए विशेष रिपोर्ट

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