बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सामने आया है। कोर्ट ने पत्नी द्वारा पति को कथित तौर पर ‘भिखारी’ कहकर अपमानित करने, लगातार झगड़े करने, मारपीट और गंभीर अविश्वास जैसे व्यवहार को मानसिक क्रूरता माना है। हाईकोर्ट ने जगदलपुर पारिवारिक अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए पति की अपील स्वीकार कर ली और मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक की डिक्री प्रदान की।
कम आमदनी को लेकर पति को देती थी ताने
मामला जगदलपुर निवासी एक दंपती से जुड़ा है। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(क) के तहत पत्नी से तलाक की मांग करते हुए आरोप लगाया था कि पत्नी उसके साथ गाली-गलौज और मारपीट करती थी। कम आमदनी को लेकर उसे लगातार ताने दिए जाते थे और कथित तौर पर ‘भिखारी’ कहकर अपमानित किया जाता था।
पति का यह भी आरोप था कि पत्नी उसके चरित्र पर संदेह करती थी और उसे अपनी मां से अलग रहने के लिए दबाव डालती थी। इन परिस्थितियों के कारण उसका वैवाहिक जीवन लगातार तनावपूर्ण बना हुआ था।
पारिवारिक अदालत ने खारिज कर दी थी याचिका
इस मामले में जगदलपुर की पारिवारिक अदालत ने 10 दिसंबर 2022 को पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद पति ने इस फैसले को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी।
वहीं, पत्नी ने पति की ओर से लगाए गए आरोपों को खारिज किया और पति तथा उसके परिजनों पर दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया।
गवाहों के बयानों और परिस्थितियों पर गौर
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के बयानों पर विचार किया। कोर्ट के अनुसार, दोनों के बीच लगातार विवाद, गंभीर अविश्वास और परिवार के सदस्यों के साथ खराब संबंध होने की स्थिति सामने आई। साथ रहने के तौर-तरीकों को लेकर भी बार-बार विवाद होते थे।
हाईकोर्ट ने माना कि पारिवारिक अदालत मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों के समग्र प्रभाव का उचित आकलन करने में विफल रही थी। वैवाहिक जीवन में लगातार अपमान, विवाद और मानसिक तनाव के प्रभाव को ध्यान में रखना आवश्यक था।
हाईकोर्ट ने दिया तलाक का आदेश
हाईकोर्ट ने जगदलपुर पारिवारिक अदालत के 10 दिसंबर 2022 के फैसले को निरस्त कर दिया। साथ ही, पति की अपील स्वीकार करते हुए मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक की डिक्री प्रदान की।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पति-पत्नी के बीच होने वाले हर छोटे-मोटे झगड़े या मतभेद को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। किसी मामले में निर्णय लेते समय दोनों के व्यवहार और उसके पूरे वैवाहिक जीवन पर पड़ने वाले संयुक्त प्रभाव का आकलन करना जरूरी है।
इस मामले में कोर्ट के अनुसार, लगातार होने वाले विवादों और कथित अपमानजनक व्यवहार से पति को हुआ मानसिक कष्ट सामान्य वैवाहिक अनबन से कहीं अधिक था। इसी आधार पर तलाक को उचित माना गया।

