बिलासपुर/कोरबा। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोरबा जिले में वर्ष 2013 में सामने आए देह व्यापार से जुड़े करीब 13 साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तीन महिलाओं को बरी किए जाने के आदेश को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि केवल स्वयं देह व्यापार में शामिल होने के आधार पर किसी व्यक्ति को अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 की धारा 4 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने कहा कि इस धारा के अंतर्गत अपराध साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को यह प्रमाणित करना आवश्यक है कि आरोपी व्यक्ति जानबूझकर किसी दूसरे व्यक्ति के देह व्यापार से होने वाली कमाई पर जीवनयापन कर रहा था। हाईकोर्ट का यह फैसला देह व्यापार से जुड़े मामलों में कानूनी प्रावधानों की व्याख्या और साक्ष्यों के महत्व को लेकर अहम माना जा रहा है।
वर्ष 2013 में कोरबा के महाराणा प्रताप नगर में हुई थी पुलिस की छापेमारी
यह पूरा मामला कोरबा जिले के महाराणा प्रताप नगर क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 11 जुलाई 2013 को पुलिस को सूचना मिली थी कि क्षेत्र के एक मकान में कथित रूप से देह व्यापार संचालित किया जा रहा है। सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने संबंधित स्थान पर छापेमारी की थी।
पुलिस कार्रवाई के बाद कुल नौ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इनमें तीन महिलाओं के विरुद्ध अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे।
मामले की जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने न्यायालय में आरोपपत्र प्रस्तुत किया। इसके बाद संबंधित प्रकरण की सुनवाई शुरू हुई।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी दो-दो साल की सजा
मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने तीनों महिलाओं को अधिनियम की धारा 6 और 7 के आरोपों से बरी कर दिया था। हालांकि, अदालत ने उन्हें धारा 4 के अंतर्गत दोषी मानते हुए प्रत्येक को दो-दो वर्ष के कठोर कारावास और 500-500 रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी।
ट्रायल कोर्ट के इस निर्णय को महिलाओं ने चुनौती दी। मामले की सुनवाई अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, फास्ट ट्रैक कोर्ट, कोरबा में हुई।
28 अगस्त 2014 को फास्ट ट्रैक कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में बदलाव करते हुए तीनों महिलाओं को धारा 4 के आरोप से भी बरी कर दिया।
फास्ट ट्रैक कोर्ट के इस फैसले से असहमत छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील प्रस्तुत की और महिलाओं को बरी किए जाने के आदेश को चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया धारा 4 का कानूनी अर्थ
राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 की धारा 4 के प्रावधानों का परीक्षण किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस धारा के तहत किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि वह जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति के देह व्यापार से अर्जित आय पर पूर्णतः या आंशिक रूप से जीवनयापन कर रहा था।
हाईकोर्ट ने स्वयं देह व्यापार में शामिल होने और किसी दूसरे व्यक्ति के देह व्यापार की कमाई पर निर्भर रहने के बीच कानूनी अंतर को महत्वपूर्ण माना।
अदालत के अनुसार, केवल किसी व्यक्ति के स्वयं देह व्यापार में शामिल होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह किसी अन्य व्यक्ति की कमाई पर निर्भर था। इसके लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं।
तीनों महिलाओं के खिलाफ दलाली के आरोप साबित नहीं
हाईकोर्ट ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए पाया कि तीनों महिलाओं के खिलाफ ऐसा कोई पर्याप्त प्रमाण नहीं था, जिससे यह स्थापित हो कि वे किसी अन्य महिला के देह व्यापार से होने वाली कमाई पर जीवनयापन कर रही थीं।
महिलाओं के विरुद्ध किसी दूसरी महिला की कमाई लेने, दलाली करने अथवा अन्य व्यक्ति के देह व्यापार से अर्जित आय पर निर्भर रहने के आरोप प्रमाणित नहीं हुए।
ऐसी स्थिति में अधिनियम की धारा 4 के अंतर्गत दोषसिद्धि के लिए आवश्यक कानूनी तत्व पूरे नहीं पाए गए।
हाईकोर्ट ने फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा महिलाओं को बरी किए जाने के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया और राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट भी दे चुका है महत्वपूर्ण निर्देश
देह व्यापार से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय पहले भी वयस्क व्यक्तियों के अधिकारों और उनकी गरिमा की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दे चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने बुद्धदेव कर्मस्कर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में कहा था कि वयस्क व्यक्तियों द्वारा आपसी सहमति से किए जाने वाले देह व्यापार के आधार पर ही उन्हें गिरफ्तार या प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि देह व्यापार में शामिल व्यक्तियों को भी संविधान के अंतर्गत सम्मानपूर्वक जीवन जीने और कानून के समान संरक्षण का अधिकार प्राप्त है।
हालांकि, मानव तस्करी, जबरन देह व्यापार, नाबालिगों का यौन शोषण और देह व्यापार से संबंधित अन्य प्रतिबंधित गतिविधियां कानून के तहत दंडनीय हैं।
क्या भारत में देह व्यापार करना अपराध है?
भारत में किसी वयस्क व्यक्ति द्वारा अपनी इच्छा और सहमति से देह व्यापार करना अपने आप में अपराध नहीं माना जाता। हालांकि, देह व्यापार से जुड़ी कई गतिविधियों पर अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 के तहत प्रतिबंध लागू हैं।
कानून के अनुसार वेश्यालय चलाना या उसका प्रबंधन करना, देह व्यापार के लिए किसी व्यक्ति को बहलाना-फुसलाना या ले जाना, किसी व्यक्ति को जबरन देह व्यापार में धकेलना, उसकी इच्छा के विरुद्ध रोककर रखना तथा प्रतिबंधित स्थानों पर देह व्यापार से जुड़ी गतिविधियां संचालित करना अलग-अलग परिस्थितियों में दंडनीय अपराध हो सकते हैं।
इसलिए हाईकोर्ट के फैसले का अर्थ यह नहीं है कि देह व्यापार से संबंधित सभी गतिविधियों को कानूनी मान्यता मिल गई है। अदालत ने विशेष रूप से धारा 4 के तहत अपराध साबित करने के लिए आवश्यक कानूनी शर्तों और साक्ष्यों पर जोर दिया है।
करीब 13 साल पुराने मामले में तीन महिलाओं को बड़ी राहत
कोरबा के महाराणा प्रताप नगर में वर्ष 2013 में हुई पुलिस कार्रवाई से शुरू हुआ यह मामला विभिन्न न्यायालयों से होते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक पहुंचा।
ट्रायल कोर्ट द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद फास्ट ट्रैक कोर्ट ने वर्ष 2014 में तीनों महिलाओं को बरी कर दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
अब हाईकोर्ट द्वारा राज्य सरकार की अपील खारिज किए जाने से तीनों महिलाओं को बरी किए जाने का फैसला बरकरार है।
यह निर्णय आपराधिक न्याय व्यवस्था में साक्ष्यों के महत्व को भी रेखांकित करता है। किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाया जाना और उस आरोप का न्यायालय में कानून के अनुसार साबित होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
CG ई खबर विशेष: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि किसी व्यक्ति को अपराध का दोषी ठहराने के लिए संबंधित कानून की सभी आवश्यक शर्तों का पूरा होना और आरोपों का पर्याप्त साक्ष्यों से साबित होना जरूरी है। कोरबा से जुड़े इस पुराने मामले में अदालत का निर्णय देह व्यापार से संबंधित कानूनी प्रावधानों और व्यक्तियों के अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

