समता, सम्मान और संविधान का संदेश ‘मनखे-मनखे एक समान’: बाबा गुरु घासीदास जी के विचार आज भी प्रासंगिक

CG.ई ख़बर



(CG ई खबर : विजय चौहान | बिलासपुर संभाग ब्यूरो चीफ)

कोरबा/छत्तीसगढ़। बाबा गुरु घासीदास जी के विचार आज भी समाज को समानता, सम्मान और मानवता की दिशा दिखाते हैं। उनका अमर संदेश— “मनखे-मनखे एक समान”— केवल नारा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और बराबरी का मूल सिद्धांत है, जो हमारे आचरण, सोच और निर्णयों को दिशा देता है।

समाज में आपसी संबंधों और विवाह को लेकर उठने वाले सवालों के बीच यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि किसी भी प्रकार का संबंध दबाव, डर या ज़ोर-जबरदस्ती से नहीं, बल्कि आपसी सहमति, समझ और सम्मान से ही स्थापित होना चाहिए। यदि किसी दूसरे समाज की बालिग बेटी स्वेच्छा से हमारे समाज में आती है और जीवन का मार्ग चुनती है, तो यह किसी पर थोपे गए निर्णय का परिणाम नहीं, बल्कि दो स्वतंत्र, बालिग व्यक्तियों की इच्छा और अधिकार का विषय है।

मान्यता और स्वीकार्यता के प्रश्न पर भावनाओं से ऊपर उठकर संविधान और कानून का मार्ग अपनाना चाहिए। भारत का संविधान प्रत्येक बालिग नागरिक को अपनी पसंद से जीवन साथी चुनने का मौलिक अधिकार देता है। यह अधिकार समानता, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों पर आधारित है।

इस संदर्भ में यह बहस जाति, दबाव या सामाजिक बंधनों की नहीं, बल्कि समझ, समता और संविधान के सम्मान की है। यही बाबा गुरु घासीदास जी का संदेश भी है— एक ऐसा समाज, जहाँ हर मनुष्य को समान दृष्टि से देखा जाए और उसके अधिकारों का पूर्ण सम्मान हो।

जय संविधान

3/related/default