कोरबा के दो बुज़ुर्गों का ऐतिहासिक संकल्प: मृत्यु के बाद भी देंगे जीवन को दिशा, किया देहदान का निर्णय

CG.ई ख़बर


(कोरबा | CG ई खबर | जिला संवाददाता: नारायण चंद्राकर)

कोरबा जिले से मानवता और समाज सेवा की एक अत्यंत प्रेरणादायक मिसाल सामने आई है। जिले के दो बुज़ुर्ग नागरिक विवारू राम नोनिया एवं बुद्धू दास महंत ने अपने निधन के पश्चात देहदान करने का संकल्प लेकर चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में अमूल्य योगदान देने का निर्णय लिया है। यह पहल न केवल समाज के लिए अनुकरणीय है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनेगी।

देहदान: चिकित्सा शिक्षा की रीढ़

देहदान वह प्रक्रिया है जिसमें कोई व्यक्ति मृत्यु के पश्चात अपना संपूर्ण शरीर मेडिकल कॉलेजों को अध्ययन एवं शोध के लिए समर्पित करता है। इससे चिकित्सा के विद्यार्थी मानव शरीर की संरचना को प्रत्यक्ष रूप से समझते हैं और व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। यह अंगदान से अलग प्रक्रिया है और बेहतर डॉक्टरों के निर्माण में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

परोपकार और आध्यात्मिक सोच की मिसाल

देहदान का निर्णय लेने वाले दोनों बुज़ुर्गों ने इसे सौभाग्य की बात बताया।

  • विवारू राम नोनिया ने कहा कि शरीर नश्वर है, लेकिन यदि यह किसी उच्च उद्देश्य की पूर्ति में लगे तो यही सच्ची सेवा है।
  • वहीं बुद्धू दास महंत ने अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहा कि यदि उनके शरीर के माध्यम से कोई विद्यार्थी डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करता है, तो यही उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

दोनों ने यह भी बताया कि उनके इस फैसले को परिवारजनों का पूर्ण सहयोग एवं सहमति प्राप्त है, जो ऐसे निर्णय में अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

देहदान की प्रक्रिया: जानिए जरूरी बातें

देहदान का संकल्प लेने के लिए व्यक्ति को किसी मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेज या विश्वसनीय संस्था से संपर्क कर पंजीकरण कराना होता है। मृत्यु के बाद शरीर को 6 से 8 घंटे के भीतर संबंधित संस्थान तक पहुंचाना आवश्यक होता है।
हालांकि, कानूनी मामलों, संक्रामक रोगों, पोस्टमॉर्टम की अनिवार्यता या शरीर की अत्यधिक क्षति की स्थिति में देहदान स्वीकार नहीं किया जाता। देहदान के लिए कोई आयु सीमा निर्धारित नहीं है।

🌍 समाज पर व्यापक प्रभाव

देहदान चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को सशक्त करता है और नैतिक रूप से एक सम्मानजनक विकल्प प्रदान करता है। पहले मेडिकल कॉलेजों को लावारिस शवों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन अब स्वैच्छिक देहदान से यह स्थिति बदल रही है।
कोरबा जैसे शहरों से उठी यह पहल समाज में जागरूकता बढ़ाने का कार्य कर रही है और अन्य नागरिकों को भी इस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित कर रही है।

प्रेरणादायक संदेश

विवारू राम नोनिया और बुद्धू दास महंत का यह निर्णय यह संदेश देता है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि ज्ञान और सेवा के माध्यम से जीवन को आगे बढ़ाने का माध्यम भी बन सकती है। उनका यह कदम आने वाले समय में समाज के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

3/related/default