टोकन नहीं, तौल में ठगी… फिर भी ‘अन्नदाता’?
(CG ई खबर | कटघोरा ब्लॉक संवाददाता: पिंकी महंत)
मंडियों में किसानों के साथ खुलेआम लूट-खसोट का खेल जारी है, लेकिन प्रशासन मूक दर्शक बना हुआ है। टोकन व्यवस्था की अव्यवस्था और तौल में हो रही हेराफेरी ने किसानों की कमर तोड़ दी है।
“तीन दिन से ट्रैक्टर पर सो रहा हूं…”
श्याम सिंह, हमीरपुर।
“पिछले तीन दिन से यहीं ट्रैक्टर पर सो रहा हूं। टोकन नहीं मिला तो दाल-रोटी भी टोकन पर चल रही है। और जब तौल हुई तो पता चला कि मेरी फसल 15 क्विंटल हल्की निकली। ये न्याय है?”
यह दर्द है छोटे किसान भोला सिंह का, जिनकी आंखों में थकान और चेहरे पर बेबसी साफ झलकती है।
भोला सिंह अकेले नहीं हैं। देश की कई प्रमुख अनाज मंडियों में किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है—
पहली, टोकन न मिलना, जिससे फसलें मंडी में पड़ी-पड़ी खराब हो रही हैं।
दूसरी, तौल में हेराफेरी, जिससे सीधे आर्थिक नुकसान हो रहा है।
टोकन के नाम पर ‘अनिश्चितता का खेल’
आमतौर पर मंडी पहुंचते ही किसान को आधिकारिक टोकन मिलना चाहिए, लेकिन बीते एक सप्ताह से हमीरपुर सहित कई मंडियों में यह व्यवस्था ठप पड़ी है। किसानों का आरोप है कि टोकन क्लर्क और कमीशन एजेंट रिश्वत मांग रहे हैं। जो नहीं देता, उसकी फसल अनदेखी का शिकार हो जाती है।
मध्य प्रदेश के किसान नरेश पाटीदार बताते हैं,
“कहते हैं सिस्टम डाउन है, लेकिन असल में यह कुछ लोगों का गठजोड़ है। जिसने ‘चाय-पानी’ करा दिया, उसका टोकन और तौल अपने आप हो जाती है।”
तौल में हेराफेरी: ‘डिजिटल’ मशीनें, ‘मैनुअल’ गड़बड़ी
टोकन के बाद तौल में दूसरा बड़ा धोखा सामने आ रहा है। किसानों का आरोप है कि डिजिटल तौल मशीनें पहले से सेट हैं, जो वास्तविक वजन से 3% से 10% तक कम दिखाती हैं। पुराने बांस के बटखरे भले ही गायब हो गए हों, लेकिन नए ‘डिजिटल बटखरे’ किसानों पर और भारी पड़ रहे हैं।
हरियाणा के युवा किसान संदीप कुमार कहते हैं,
“मेरे 50 बोरे थे, हर बोरा करीब 50 किलो का था। मशीन ने औसतन 48 किलो दिखाया। पूरी फसल में 100 किलो का नुकसान हुआ। ये सीधी चोरी है—सरकारी चोरी!”
प्रशासन का रुख: ‘जांच होगी’
मंडी अधिकारियों ने इसे ‘तकनीकी खराबी’ और ‘अलग-अलग मापदंड’ का मामला बताया।
हमीरपुर मंडी समिति के सचिव का कहना है,
“टोकन सिस्टम में दिक्कत आई थी, जिसे ठीक कर दिया गया है। तौल मशीनों का कैलिब्रेशन नियमित होता है। शिकायत लिखित में दें, जांच करवाई जाएगी।”
लेकिन किसानों का सवाल है—जब फसल खराब होने की कगार पर हो, तब लिखित शिकायत और जांच का लंबा चक्र उनकी मदद कैसे करेगा?
किसान संगठनों का आक्रोश
किसान नेता राकेश टिकैत ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा,
“यह किसानों के खिलाफ सुनियोजित षड्यंत्र है। मंडी व्यवस्था पर दलालों और भ्रष्ट अधिकारियों का कब्जा है। तुरंत टोकन व्यवस्था पारदर्शी बनाई जाए और सभी तौल मशीनों की तृतीय-पक्ष जांच हो। दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।”
निष्कर्ष: व्यवस्था पर उठता भरोसा
यह मामला सिर्फ टोकन या तौल का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर उठते अविश्वास का प्रतीक है, जो किसान को उसके हक से वंचित कर रही है। जब तक मंडियों में पारदर्शिता और जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक भोला सिंह जैसे करोड़ों किसानों की आंखों में यही सवाल रहेगा—
“क्या हमारे परिश्रम और अन्न का यही मूल्य है?”


