कोरबा। जिला प्रशासन एवं नगर निगम कोरबा के संयुक्त तत्वावधान में 18 जुलाई को आयोजित होने वाले "एक पेड़ माँ के नाम – रन फॉर ग्रीन" कार्यक्रम का आमंत्रण पत्र इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चा कार्यक्रम को लेकर नहीं, बल्कि आमंत्रण पत्र में अतिथियों के नाम और पदों के उल्लेख के क्रम को लेकर हो रही है। प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या सरकारी आयोजनों में संवैधानिक पदों के प्रोटोकॉल और स्थापित शिष्टाचार का पूरी तरह पालन किया जाना चाहिए?
आमंत्रण पत्र में प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री लखनलाल देवांगन को मुख्य अतिथि, नगर निगम महापौर संजू देवी राजपूत को अध्यक्ष तथा कोरबा लोकसभा सांसद ज्योत्सना चरणदास महंत को विशिष्ट अतिथि के रूप में दर्शाया गया है। मुख्य अतिथि और अध्यक्ष का चयन आयोजकों का अधिकार होता है, लेकिन सरकारी कार्यक्रमों में मंचीय प्रोटोकॉल और संवैधानिक पदों की गरिमा को लेकर लंबे समय से स्थापित परंपराएं भी रही हैं।
सांसद और महापौर के क्रम पर उठे सवाल
प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि सांसद एक संवैधानिक पद है और सरकारी आयोजनों में उनके प्रोटोकॉल को विशेष महत्व दिया जाता है। ऐसे में आमंत्रण पत्र में महापौर के बाद सांसद का उल्लेख किए जाने को लेकर स्वाभाविक रूप से चर्चाएं शुरू हो गई हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या भारत सरकार के प्रोटोकॉल के अनुसार लोकसभा सांसद का स्थान महापौर से ऊपर नहीं माना जाता?
पहले भी उठ चुके हैं ऐसे विवाद
यह पहला अवसर नहीं है जब नगर निगम के किसी सरकारी आयोजन में प्रोटोकॉल को लेकर सवाल उठे हों। इससे पहले भी भूमिपूजन और लोकार्पण कार्यक्रमों के शिलालेखों में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के साथ राजनीतिक दलों के संगठनात्मक पदाधिकारियों के नाम प्रमुखता से अंकित किए जाने को लेकर बहस होती रही है। स्थानीय स्तर पर इसे लेकर कई बार सवाल उठे कि क्या सरकारी शिलालेखों में पार्टी पदाधिकारियों को निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से ऊपर दर्शाना उचित है।
अब 'रन फॉर ग्रीन' कार्यक्रम का आमंत्रण पत्र भी इसी बहस को फिर से चर्चा के केंद्र में ले आया है।
मुद्दा आयोजन नहीं, व्यवस्था का
पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम की व्यापक सराहना की जा रही है। सवाल कार्यक्रम या किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेजों और आमंत्रण पत्रों में संवैधानिक संस्थाओं एवं पदों के सम्मान तथा स्थापित प्रोटोकॉल के पालन को लेकर उठ रहे हैं।
आयोजक का अधिकार, लेकिन प्रोटोकॉल भी महत्वपूर्ण
मुख्य अतिथि और अध्यक्ष का निर्धारण आयोजकों का विशेषाधिकार होता है। इसलिए किसी मंत्री को मुख्य अतिथि और महापौर को अध्यक्ष बनाए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि मंचीय सूची, स्वागत क्रम और सरकारी आमंत्रण पत्रों में संवैधानिक पदों का उल्लेख करते समय प्रोटोकॉल का ध्यान रखना सार्वजनिक शिष्टाचार का हिस्सा माना जाता है।
यदि यह केवल डिज़ाइन या प्रारूप संबंधी त्रुटि है, तो प्रशासन इस विषय पर स्थिति स्पष्ट कर सकता है, जिससे भविष्य में इस प्रकार की चर्चाओं और अनावश्यक विवादों से बचा जा सके।
प्रोटोकॉल के संदर्भ में सामान्य क्रम
भारत सरकार के Order of Precedence के अनुसार सामान्य रूप से संबंधित पदों का क्रम इस प्रकार माना जाता है—
- राज्यपाल
- मुख्यमंत्री
- केंद्रीय मंत्री
- राज्य के कैबिनेट मंत्री (राज्य में उच्च प्रोटोकॉल)
- सांसद (लोकसभा/राज्यसभा)
- विधायक
- महापौर (स्थानीय निकाय)
विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य के कैबिनेट मंत्री का अपने राज्य में उच्च प्रोटोकॉल होना स्वाभाविक है, इसलिए उन्हें मुख्य अतिथि बनाया जाना पूरी तरह उचित है। लेकिन यदि उसी कार्यक्रम में लोकसभा सांसद भी उपस्थित हों, तो मंचीय सूची और सार्वजनिक उल्लेख में उनके स्थान को लेकर प्रोटोकॉल का पालन अपेक्षित माना जाता है।
इसी कारण यह आमंत्रण पत्र अब प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन इस पर कोई स्पष्टीकरण जारी करता है या भविष्य के आयोजनों में प्रोटोकॉल संबंधी पहलुओं पर अतिरिक्त सावधानी बरती जाती है।


