कोरबा। छत्तीसगढ़ में गौवंश संरक्षण के लिए कानून मौजूद है, लेकिन उसके प्रभावी क्रियान्वयन और गौवंश की मौत के हर मामले में स्पष्ट जवाबदेही तय करने की मांग अब जोर पकड़ने लगी है। पशुओं को लावारिस छोड़ने वालों की जिम्मेदारी तय करने को लेकर समय-समय पर निर्देश जारी होते रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
उरगा थाना क्षेत्र के कुदुरमाल मार्ग में पेट्रोल पंप के पास हुई घटना और हाल ही में कोरबा-दर्री मार्ग के नए पुल पर 17 मवेशियों की मौत व घायल होने की घटना से विचलित एक गौशाला संचालक ने अपनी पीड़ा और चिंता साझा करते हुए सरकार के सामने कई सवाल रखे हैं।
गौशाला संचालक का सीधा सवाल है कि “कुत्ते जैसे पशु के साथ क्रूरता पर कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन सड़क दुर्घटना में गाय की मौत हो जाए, किसी वाहन से गौवंश कुचलकर मर जाए, करंट लगने या लावारिस हालत में उसकी मौत हो जाए तो उसके लिए स्पष्ट प्रक्रिया क्या है?”
गौवंश की मौत के मामलों में स्पष्ट प्रक्रिया की मांग
जानकारों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में गौवंश की हत्या और अवैध परिवहन के खिलाफ कानून मौजूद है। राज्य में छत्तीसगढ़ कृषि पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 लागू है। इसमें कृषि पशुओं के वध, प्रतिबंधित मांस के कब्जे और वध के उद्देश्य से परिवहन पर कार्रवाई का प्रावधान है। अवैध गौवंश परिवहन में प्रयुक्त वाहनों के खिलाफ राजसात की कार्रवाई भी प्रशासन द्वारा की जाती रही है।
हालांकि, गौशाला संचालकों की मांग इससे आगे की है। उनका कहना है कि सड़क दुर्घटना, लापरवाही, जानबूझकर वाहन से कुचलने, घायल पशु की चिकित्सा, मृत पशु के पोस्टमार्टम और पशु मालिक अथवा जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान जैसी परिस्थितियों के लिए स्पष्ट और एक समान प्रक्रिया होनी चाहिए।
हर गौवंश की टैगिंग और डिजिटल रिकॉर्ड की मांग
गौशाला संचालक का सुझाव है कि प्रत्येक गौवंश को यूनिक टैग नंबर देकर उसके मालिक, स्थान, नस्ल, उम्र, टीकाकरण और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाए।
इससे चोरी और अवैध परिवहन पर नियंत्रण के साथ-साथ सड़क दुर्घटना में मृत या घायल पशु के मालिक की पहचान भी तत्काल हो सकेगी। संदिग्ध मौत की स्थिति में पशु चिकित्सक की जांच और पोस्टमार्टम को आवश्यक प्रक्रिया बनाया जा सकता है, जिससे दुर्घटना, बीमारी और जानबूझकर की गई हिंसा के बीच अंतर स्पष्ट करने में मदद मिलेगी।
गौशालाओं में भी पारदर्शिता की संभावना
टैगिंग व्यवस्था से गौशालाओं में मौजूद पशुओं की वास्तविक संख्या का रिकॉर्ड भी तैयार किया जा सकता है। कितने पशु गौशाला में आए, कितने की मृत्यु हुई और कितने अन्यत्र भेजे गए, इसका डिजिटल हिसाब रखा जा सकेगा।
यदि गौशालाओं को प्रति पशु सरकारी सहायता या अनुदान दिया जाता है, तो टैगिंग से वास्तविक पशु संख्या का सत्यापन संभव होगा और सरकारी सहायता व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ सकती है। हालांकि, कोरबा में कुछ सेवाभावी लोग आपसी सहयोग से भी गौशालाओं का संचालन कर रहे हैं।
‘कृषि पशु’ से आगे अलग संरक्षित श्रेणी की मांग
गौशाला संचालकों का कहना है कि गौवंश को केवल कृषि उपयोगिता के आधार पर देखने के बजाय उसकी जीवन-सुरक्षा और कल्याण के लिए अलग कानूनी संरक्षण दिया जाना चाहिए।
इसके लिए मौजूदा कानून में अलग अध्याय जोड़ने अथवा स्वतंत्र ‘संरक्षित गौवंश अधिनियम’ बनाने का सुझाव सामने आया है। इसमें गौवंश की पहचान, स्वास्थ्य, चिकित्सा, परिवहन, दुर्घटना और मृत्यु की जांच सहित जन्म से मृत्यु तक की जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था की जा सकती है।
‘राज्यमाता’ का दर्जा मिले तो उसके साथ ठोस व्यवस्था भी हो
महाराष्ट्र सरकार ने वर्ष 2024 में देशी गाय को ‘राज्यमाता-गोमाता’ का दर्जा दिया था। वहां इस निर्णय के साथ देशी गायों के संरक्षण और गौशालाओं को आर्थिक सहायता से जुड़ी नीतियों को भी जोड़ा गया।
गौशाला संचालकों का कहना है कि यदि छत्तीसगढ़ में भी गौवंश को ‘राज्यमाता’ या ‘राज्य संरक्षित पशु’ का दर्जा देने की दिशा में कदम बढ़ाया जाता है, तो इसके साथ टैगिंग, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, गौशाला सहायता, दुर्घटना सहायता और मृत्यु की जांच जैसी ठोस व्यवस्थाएं भी लागू की जानी चाहिए।
कानून कितना है नहीं, कितना प्रभावी है—यह अहम सवाल
गौवंश वध और अवैध परिवहन के खिलाफ छत्तीसगढ़ में कानून मौजूद है और उसके तहत कार्रवाई भी होती रही है। अब आवश्यकता ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है, जिसमें गौवंश की पहचान से लेकर उसकी सुरक्षा, चिकित्सा और मृत्यु तक जिम्मेदारी तय हो।
गौशाला संचालक का कहना है कि गौवंश संरक्षण केवल भावनात्मक अपील तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि हर पशु की पहचान और उसके मालिक की जिम्मेदारी तय हो, तो लावारिस पशुओं, सड़क दुर्घटनाओं, संदिग्ध मौतों और अवैध परिवहन जैसे मामलों में जवाबदेही तय करना आसान होगा।
इसी व्यवस्था के जरिए ‘राज्यमाता’ या ‘राज्य संरक्षित गौवंश’ जैसी अवधारणा को वास्तविक और प्रभावी संरक्षण में बदला जा सकता है।



