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‘मोदी एक्ट’ क्या है? SC/ST कानून के 2018 संशोधन से क्यों जुड़ा यह नाम, अधिकारों और विवाद की पूरी कहानी


(CG ई खबर | प्रमुख संपादक : ओम प्रकाश पटेल)

नई दिल्ली/विशेष रिपोर्ट। देश में इन दिनों सोशल मीडिया और कुछ संगठनों के अभियानों में “मोदी एक्ट” नाम चर्चा में है। लेकिन सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि “मोदी एक्ट” भारत के कानून की आधिकारिक किताब में दर्ज किसी अधिनियम का नाम नहीं है। यह नाम मुख्य रूप से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 में 2018 में किए गए संशोधन को नरेंद्र मोदी सरकार से जोड़कर इस्तेमाल किया जा रहा है।

इस पूरे विवाद को समझने के लिए तीन तारीखें महत्वपूर्ण हैं—1989, 20 मार्च 2018 और 2018 का संसदीय संशोधन, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के 2020 के फैसले ने कानूनी स्थिति को और स्पष्ट किया।

1989 में बना था SC/ST अत्याचार निवारण कानून

SC/ST (Prevention of Atrocities) Act वर्ष 1989 में बनाया गया था। इसका मूल उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ जातिगत अत्याचारों को रोकना, ऐसे अपराधों के लिए विशेष कानूनी प्रावधान करना तथा पीड़ितों को कानूनी संरक्षण उपलब्ध कराना था। केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर भी 1989 के मूल अधिनियम और 2018 के संशोधन को अलग-अलग कानून के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि SC/ST Act स्वयं नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा बनाया गया कानून है।

फिर “मोदी एक्ट” नाम आया कहां से?

विवाद की जड़ 20 मार्च 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में है। Dr. Subhash Kashinath Mahajan v. State of Maharashtra मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय बताए थे।

इनमें परिस्थितियों के अनुसार प्रारंभिक जांच, तथा कुछ मामलों में गिरफ्तारी से पहले संबंधित अधिकारी की मंजूरी जैसी व्यवस्थाएं शामिल थीं। अदालत का उद्देश्य यह था कि कानून का इस्तेमाल वास्तविक मामलों में हो और निर्दोष लोगों को अनावश्यक गिरफ्तारी अथवा कानूनी उत्पीड़न से सुरक्षा मिल सके। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इन दिशानिर्देशों की स्थिति पर पुनर्विचार किया।

इसके बाद संसद ने 2018 में SC/ST Act में संशोधन किया और धारा 18A जोड़ी गई।

यही संशोधन आज “मोदी एक्ट” नाम से कुछ वर्गों में प्रचारित किया जा रहा है।

2018 के संशोधन में क्या बदला?

धारा 18A के तहत मुख्य रूप से तीन महत्वपूर्ण बातें सामने आईं—

पहली—FIR से पहले अनिवार्य प्रारंभिक जांच नहीं।
SC/ST Act के तहत FIR दर्ज करने से पहले सामान्य तौर पर preliminary enquiry को अनिवार्य नहीं रखा गया।

दूसरी—गिरफ्तारी के लिए अलग पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं।
कानून में यह प्रावधान किया गया कि आरोप लगने पर आवश्यक गिरफ्तारी के लिए जांच अधिकारी को किसी अतिरिक्त पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी।

तीसरी—अग्रिम जमानत पर विशेष प्रतिबंध।
धारा 18A(2) ने यह स्पष्ट किया कि सामान्य अग्रिम जमानत संबंधी प्रावधान SC/ST Act के मामलों में लागू नहीं होंगे।

यहीं से इस संशोधन को लेकर सबसे बड़ा विवाद पैदा हुआ।


आलोचना क्यों हो रही है?

“मोदी एक्ट” शब्द का इस्तेमाल करने वाले आलोचकों का मुख्य तर्क है कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ SC/ST Act में शिकायत दर्ज होती है, तो FIR और गिरफ्तारी की प्रक्रिया में पहले से मौजूद कुछ सुरक्षा फिल्टर कम हो जाते हैं।

आलोचकों का कहना है कि इससे झूठी, दुर्भावनापूर्ण या व्यक्तिगत विवादों से जुड़ी शिकायतों की स्थिति में आरोपी को गंभीर कानूनी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

इसी वजह से कुछ लोग इसे आरोपी के निष्पक्ष प्रक्रिया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े हितों के लिए कठोर मानते हैं।

लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि “SC/ST Act का हर मामला झूठा होता है” ऐसा निष्कर्ष कानून या सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से नहीं निकलता।


दूसरी तरफ सरकार और कानून के समर्थकों का तर्क क्या है?

इस कानून का मूल उद्देश्य ही जातिगत अत्याचारों से SC/ST समुदाय को सुरक्षा देना है।

समर्थकों का तर्क है कि यदि FIR से पहले लंबी प्रारंभिक जांच या गिरफ्तारी से पहले अतिरिक्त अनुमति जैसी शर्तें अनिवार्य कर दी जाएं, तो वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी हो सकती है।

इसी कारण 2018 के संशोधन में प्रक्रिया को अधिक कठोर बनाया गया, ताकि शिकायत दर्ज कराने और कानून लागू करने में अतिरिक्त बाधाएं न रहें। सुप्रीम कोर्ट के 2020 के फैसले में भी 2018 संशोधन के पीछे संसद की यही मंशा दर्ज है कि FIR के पंजीकरण और कानून के कठोर प्रवर्तन में देरी न हो।


क्या इससे किसी के अधिकार मजबूत हुए और किसी के कमजोर?

हां, प्रक्रियात्मक दृष्टि से ऐसा कहा जा सकता है, लेकिन इसे समझना जरूरी है।

SC/ST समुदाय के पीड़ितों के दृष्टिकोण से

2018 के संशोधन ने कानून के इस्तेमाल की प्रक्रिया को मजबूत किया।

  • FIR से पहले अनिवार्य preliminary enquiry की शर्त हटाई गई।
  • गिरफ्तारी के लिए अलग पूर्व अनुमति की आवश्यकता को हटाया गया।
  • कानून के तहत कार्रवाई में प्रक्रियात्मक बाधाएं कम की गईं।

इसका उद्देश्य वास्तविक पीड़ितों की शिकायतों पर तेजी से कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना था।

आरोपी के दृष्टिकोण से

दूसरी ओर, आरोपी के लिए कुछ प्रक्रियात्मक सुरक्षा सीमित हुईं।

  • FIR से पहले अनिवार्य प्रारंभिक जांच नहीं।
  • गिरफ्तारी से पहले विशेष अनुमति की व्यवस्था नहीं।
  • SC/ST Act के मामलों में अग्रिम जमानत पर विशेष कानूनी रोक।

यानी कानून ने पीड़ित पक्ष की तत्काल कानूनी सुरक्षा को प्राथमिकता दी, जबकि आरोपी के लिए शुरुआती चरण की कुछ प्रक्रियात्मक सुरक्षा सीमित की।


लेकिन क्या SC/ST Act में आरोपी के सारे अधिकार खत्म हो गए?

नहीं। यह समझना बहुत जरूरी है।

10 फरवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने Prathvi Raj Chauhan v. Union of India मामले में 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला दिया।

अदालत ने धारा 18 और 18A की संवैधानिक स्थिति को बरकरार रखा, लेकिन एक महत्वपूर्ण सुरक्षा भी स्पष्ट की—

यदि शिकायत में प्रथम दृष्टया (prima facie) SC/ST Act का अपराध बनता ही नहीं है, तो धारा 18 और 18A के तहत अग्रिम जमानत की रोक लागू नहीं होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि असाधारण परिस्थितियों में अदालतें कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए अपने उपलब्ध न्यायिक अधिकारों का इस्तेमाल कर सकती हैं।

इसका अर्थ है कि SC/ST Act का मामला दर्ज होना अपने आप में यह नहीं बनाता कि अदालत आरोपी को किसी भी परिस्थिति में राहत नहीं दे सकती।


तो असली विवाद आखिर है क्या?

पूरे विवाद को दो अलग-अलग अधिकारों के बीच संतुलन के रूप में समझा जा सकता है।

एक तरफ—

SC/ST समुदाय को जातिगत अपमान, हिंसा और अत्याचार से प्रभावी कानूनी सुरक्षा देने का अधिकार।

दूसरी तरफ—

किसी आरोपी को निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोपों से न्यायिक संरक्षण मिलने का अधिकार।

2018 का संशोधन पहले पक्ष की सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में गया, जबकि आलोचक मानते हैं कि इससे दूसरे पक्ष की शुरुआती प्रक्रियात्मक सुरक्षा कमजोर हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया, बल्कि इसकी संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए यह स्पष्ट किया कि जहां प्रथम दृष्टया SC/ST Act का अपराध बनता ही नहीं है, वहां अग्रिम जमानत की रोक स्वतः लागू नहीं होगी।


“मोदी एक्ट” कहना कितना सही?

कानूनी रूप से “मोदी एक्ट” कहना सही आधिकारिक नाम नहीं है।

सही नाम है—

Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Amendment Act, 2018

या हिंदी में—

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2018।

यह संशोधन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल में संसद द्वारा पारित किया गया था। इसी राजनीतिक संदर्भ के कारण कुछ लोग इसे “मोदी एक्ट” कह रहे हैं।

लेकिन इसे भारत के किसी अलग “मोदी एक्ट” कानून के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।


निष्कर्ष: विवाद कानून के नाम से ज्यादा उसके संतुलन पर है

“मोदी एक्ट” नाम से चल रही मौजूदा बहस वास्तव में SC/ST Act और उसके 2018 के संशोधन को लेकर है।

2018 में कानून को इस दिशा में बदला गया कि SC/ST अत्याचार के मामलों में FIR और कार्रवाई शुरू करने के लिए अतिरिक्त प्रक्रियात्मक बाधाएं न रहें। इससे पीड़ितों की कानूनी सुरक्षा और त्वरित कार्रवाई की क्षमता मजबूत हुई, जबकि आरोपी के लिए FIR से पहले जांच तथा गिरफ्तारी से पहले विशेष अनुमति जैसी कुछ प्रक्रियात्मक सुरक्षा सीमित हुईं।

वहीं सुप्रीम कोर्ट ने बाद में यह स्पष्ट किया कि यदि शिकायत से प्रथम दृष्टया SC/ST Act का अपराध बनता ही नहीं है, तो अग्रिम जमानत पर धारा 18/18A की रोक लागू नहीं होगी।

इसलिए इस पूरे विषय को केवल “कानून सही है” या “कानून गलत है” के रूप में देखना अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि जातिगत अत्याचार से पीड़ित व्यक्ति को प्रभावी सुरक्षा मिले और साथ ही झूठे अथवा दुर्भावनापूर्ण आरोपों की स्थिति में निर्दोष व्यक्ति को न्यायिक संरक्षण भी मिले—इन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

CG ई खबर की तथ्य-जांच: “मोदी एक्ट” कोई आधिकारिक अधिनियम नहीं, बल्कि 2018 के SC/ST Act संशोधन के लिए इस्तेमाल हो रहा एक प्रचलित/राजनीतिक नाम है। कानून की वास्तविक स्थिति समझने के लिए 1989 के मूल अधिनियम, 2018 के संशोधन और सुप्रीम कोर्ट के 2020 के फैसले—तीनों को साथ पढ़ना जरूरी है।

नोट: यह समाचार सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है। किसी व्यक्तिगत SC/ST Act मामले में लागू धाराएं, जमानत और न्यायिक उपाय मामले के तथ्यों पर निर्भर करते हैं।

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